December 10, 2022
bhasha kise kahate hain

भाषा किसे कहते हैं? भाषा की परिभाषा, भेद, प्रकार और उदाहरण (हिंदी व्याकरण)

भाषा किसे कहते हैं? भाषा की परिभाषा, भेद और उदाहरण (हिंदी व्याकरण), Hindi main Bhasha kise kahate hain? bhasha ki paribhasha, bhasha ke prakar, or bhasha ke bhed or Udaaharan. हम सामान्य जीवन में किसी न किसी माधयम से एक दूसरे से वार्तालाप करते हैं, फिर चाहे वह मूक रूप में हो या लिखित या फिर मौखिक, आपके मन में कभी न कभी यह प्रश्न जरूर आया होता की आखिर भाषा की परिभाषा क्या होगी? यदि आप विद्यार्थी हैं और हिंदी भाषा में कुछ जानना चाहते हैं तो भाषा सबसे महत्वपूर्ण है और इसी के बाद आप अन्य अध्याय पढ़ सकते हैं।

हिंदी व्याकरण में समझते हैं की भाषा किसे कहते हैं? भाषा की परिभाषा क्या होती है? भाषा कितने प्रकार की होती है? भाषा के कितने भेद होते हैं? तथा भाषा के कुछ उदाहरण

भाषा किसे कहते हैं? भाषा की परिभाषा, भेद, प्रकार और उदाहरण

ऊपर दिए गए सभी प्रश्नों के उत्तर यहाँ दिए गए हैं, यदि आप सम्पूर्ण हिंदी व्याकरण पढ़ना चाहते हैं तो आप यहाँ पढ़ सकते हैं – हिंदी व्याकरण

इस लेख में आप परिभाषा, स्वरूप, शब्द,अर्थ, सौंदर्य, कार्य, उत्पत्ति, विकास, हिन्दी भाषा की विशेषता पढ़ोगे।

भाषा किसे कहते हैं?

‘‘भाषा वह साधन है, जिसके माध्यम से मनुष्य बोलकर, लिखकर या संकेत पर परस्पर अपना विचार सरलता, स्पष्टता, निश्चितता तथा पूर्णता के साथ प्रकट करता है।’’ या फिर सरल शब्दों में कहा जाए तो मनोभाव को व्यक्त करना भाषा है

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भाषा को हम दो रूपों में ही स्पष्टतया व्यक्त करते हैं- लिखकर अथवा बोलकर; परन्तु सांकेतिक भाषा का भी अपना महत्व हुआ करता है। यह सांकेतिक रूप कई रूपों में हमारे सामने आता है।

उदाहरण स्वरूप- 

(क) विभिन्न रंगों से संकेत कर : ट्रैफिक  चौराहे पर लाल और हरे रंगों द्वारा खास-खास बातें कही जाती हैं। लाल रंग ठहरने का और हरा रंग आगे बढ़ने की तरफ इशारा करता है। अस्पतालों में भी रंगों का प्रयोग देखने को मिलता है। इसी तरह विभिन्न अधिकारियों की गाड़ियों में भी रंगीन बल्बों द्वारा खास तरह की सांकेतिक भाषा का प्रयोग किया जाता है।

(ख) ध्वनि-संकेत : भारी लट्ठों या वजनी सामानों को उठाने या धकेलने में ध्वनि-संकेत दिखता है। सायरन की आवाज, भोंपू की आवाज, स्कूलों में घंटी की आवाज, अग्निशामक यंत्रों की आवाज; इसी तरह मवेशियों या पक्षियों को कुछ कहने या समझाने के लिए हम ध्वनि-संकेतों का प्रयोग करते हैं। यह ध्वनि-संकेत शब्दों या वाक्यों में दर्शाए नहीं जा सकते; परन्तु इनका महत्व तो होता ही है।

(ग) आंगिक-संकेत: विभिन्न अवसरों पर हम अपने विभिन्न अंगों जैसे मुख, नाक, आँख, हाथ, ओठ, गर्दन, ऊँगली आदि द्वारा अपने मन के भाव को व्यक्त करते हैं या अभिव्यक्ति से अवगत होते हैं। इन आंगिक संकेतों के कारण ही भाषा में अंगों से संबंधित मुहावरों का प्रयोग दिखता है।

स्मरणीय तथ्य 

  1. ‘राजस्थानी हिन्दी’ का विकास ‘अपभ्रंश से हुआ।
  2. ‘पश्चिमी हिन्दी’ का विकास ‘शौरसेनी’ से हुआ।
  3. ‘पूर्वी हिन्दी’ का विकास ‘अर्द्धमागधी’ से हुआ।
  4. ‘बिहारी हिन्दी’ का विकास ‘मागधी’ से हुआ।
  5. ‘पहाड़ी हिन्दी’ का विकास ‘खस’ से हुआ।

किसी भाषा के दो मुख्य आधार हुआ करते हैं-

  1. मानसिक आधार (Mental Aspect) और
    मानसिक आधार से आशय है, वे विचार या भाव, जिनकी अभिव्यक्ति के लिए वक्ता भाषा का प्रयोग करता है
  2. भौतिक आधार (Physical Aspect) 
    भौतिक आधार के जरिए श्रोता ग्रहण करता है। इसके सहारे भाषा में प्रयुक्त ध्वनियाँ (वर्ण, अनुतान, स्वराघात आदि) और इनसे निकलने वाले विचारों या भावों को ग्रहण किया जाता है।

जैसे- ‘फूल’ शब्द का प्रयोग करने वाला भी इसके अर्थ से अवगत होगा और जिसके सामने प्रयोग किया जा रहा (सुनने वाला) वह भी। यानी भौतिक आधार अभिव्यक्ति का साधन है और मानसिक आधार साध्य। दोनों के मिलने से ही भाषा का निर्माण होता है। इन्हें ही ‘बाह्य भाषा’ (Outer Speech) और आन्तरिक भाषा(Inner Speech) कहा जाता है।

उपर्युक्त प्रभावों के कारण अनुकरणात्मक विविधता के कुछ उदाहरण देखें-

तृष्णा > तिसना/टिसना, परीक्षा >  परिच्छा

शिक्षा > सिच्छा, क्षत्रिय > छत्री

षड्यंत्र > खडयंत्र, स्टेशन > इस्टेशन/टिशन

रिपोर्ट > रपट, स्कूल > ईसकूल

राजेन्द्र > रजिन्दर/राजेन्दर, मास्टर > मसटर/महटर

ट्रेजेडी > त्रासदी, प्राण > परान

अंदाज > अंजाद, मतलब > मतबल

लखनऊ > नखलऊ

ग्रियर्सन के अनुसार भारत में 6 भाषा-परिवार, 179 भाषाएँ और 544 बोलियाँ हैं- 

(क) भारोपीय परिवार: उत्तरी भारत में बोली जानेवाली भाषाएँ

(ख) द्रविड़ परिवार: तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम।

(ग) आस्टिक परिवार: संताली, मुंडारी, हो, सवेरा, खड़िया, कोर्क, भूमिज, गदवा, फलौंक, वा, खासी, मोनख्मे, निकोबारी।

(घ) तिब्बती-चीनी : लुशेइ, मेइथेइ, मारो, मिश्मी, अबोर-मिरी, अक।

(ड़) अवर्गीकृत : बुरूशास्की, अडमानी

(च) करेन तथा मन: बर्मा की भाषा (जो अब स्वतंत्र है)

हिन्दी भाषा पर एक नजर

बहुत सारे विद्वानों का मत है कि हिन्दी भाषा संस्कृत से निष्पन्न है; परन्तु यह बात सत्य नहीं है। हिन्दी की उत्पत्ति अपभ्रंश भाषाओं से हुई है और अपभ्रंश की उत्पत्ति प्राकृत से। प्राकृत भाषा अपने पहले की पुरानी बोलचाल की संस्कृत से निकली है। स्पष्ट है कि हमारे आदिम आर्यों की भाषा पुरानी संस्कृत थी। उनके नमूने श्रृग्वेद में दिखते हैं। उसका विकास होते-होते कई प्रकार की प्राकृत भाषाएँ पैदा हुई।

हमारी विशुद्ध संस्कृत किसी पुरानी प्राकृत से ही परिमार्जित हुई हैं। प्राकृत भाषाओं के बाद अपभ्रशों का जन्म हुआ और उनसे वर्तमान संस्कृतोत्पन्न भाषाओं की। हमारी वर्तमान हिन्दी, अर्द्धमागधी और शौरसेनी अपभ्रंश से निकली है।

हिन्दुस्तानी भाषा के दो रूप हैं। एक तो वह जो पश्चिमी हिन्दी की शाखा है, दूसरी वह जो साहित्य में काम आती हैं।

1963 ई. के अधिनियम के अनुसार भाषा-क्षेत्र 

क्षेत्र राज्य
(क) बिहार, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली और उत्तराखंड
(ख) गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब, अंडमान-निकोबार द्वीप-समूह और केन्द्रशासित राज्य
(ग) शेष राज्य

देवनागरी लिपि

हिन्दी’ और ‘संस्कृत’ देवनागरी लिपि में लिखी जाती है। ‘देवनागरी’ लिपि का विकास ‘ब्राह्री लिपि’ से हुआ, जिसका सर्वप्रथम प्रयोग गुजरात नरेश जयभट्ट के एक शिलालेख में मिलता है। 8वीं एवं 8वीं एवं 9वीं सदी मे ंक्रमशः राष्ट्रकूट नरेशों तथा बड़ौदा के ध्रुवराज ने अपने देशों में इसका प्रयोग किया था। महाराष्ट्र में इसे ‘बालबोध’ के नाम से संबोधित किया गया।

देवनागरी लिपि पर तीन भाषाओं का बड़ा महत्वपूर्व प्रभाव पड़ा। 

(i) प्रभाव: पहले देवनागरी लिपि में जिहामूलीय ध्वनियों को अंकित करने के चिन्ह नहीं थें, जो बाद में फारसी से प्रभावित होकर विकसित हुए- क, ख, ग, ज, फ।

(ii) बांग्ला प्रभाव: गौल-गौल लिखने की परम्परा बांग्ला लिपि के प्रभाव के कारण शुरू हुई।

(iii) रोमन प्रभाव: इससे प्रभावित हो विभिन्न विराम चिन्हों, जैसे- अल्प विराम, अर्द्ध विराम, प्रश्नसूचक चिन्ह, विस्मयसूचक चिन्ह, उद्धरण चिन्ह एव पूर्ण विराम में ‘खड़ी पाई’ की जगह ‘बिन्दु (Point) का प्रयोग होने लगा।

देवनागरी लिपि की विशेषताएँ :

इसके ध्वनि क्रम पूर्णतया वैज्ञानिक हैं।
प्रत्येक वर्ग में अघोष फिर सघोष वर्ण हैं।
वर्गों की अंतिम ध्ववियाँ नासिक्य हैं।
छपाई एवं लिखाई दोनों समान हैं।
ह्रस्व एवं दीर्घ में स्वर बँटे हैं।
निश्चित मात्राएँ हैं
उच्चारण एवं प्रयोग में समानता है।
प्रत्येक के लिए अलग लिपि चिन्ह है।

  1. हिंदी में ऑनलाइन टेस्ट
  2. तर्कशक्ति (Reasoning)
  3. हिंदी (Hindi)
  4. सामान्य ज्ञान (GK)
  5. गणित (Maths)

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